Mohini

by Lokesh Gulyani
Rs 300.00   (Inclusive of all taxes)

Author :  Lokesh Gulyani

Publisher :  Shrija Publisher

Language :  Hindi

ISBN :  9789334388480

Item Code :  SPP006

Pages :  182

Weight :  250 GM

Dimensions :  23 X 15 CM

Edition :  2025

Binding :  PAPERBACK

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लेखक के बारे में : मीडिया एवं जनसम्पर्क सलाहकार लोकेश गुलयानी बतौर लेखक अपनी उपस्थिति अब संजीदगी से कराने लगे हैं। इसका पता उनके हाल ही में आए चर्चित कहानी संग्रह ‘लड़कियाँ होंगी’ से पता चलता है। यह क़िताब ‘मोहिनी’ उनकी ग्यारहवीं किताब और चौथा उपन्यास है। जयपुर-राजस्थान के रहने वाले लोकेश काम के सिलसिले में भारत के विभिन्न राज्यों में भ्रमण करते रहे और एक लम्बा समय भोपाल भी रहे। भोपाल प्रवास उनकी विशिष्ट यादों का हिस्सा है। वे अपनी कहानियाँ और पात्र यूँ ही चलते फिरते उठा लेते हैं। लोगों से बात करते हुए या उनका अवलोकन करते हुए, उनमें कुछ गहन ढूंढ लेने में उन्हें दक्ष कहा जा सकता है। आम ज़िन्दगी में लोकेश कम शब्दों वाले इंसान हैं। उन्हें बोलने से अधिक सुनने में और मनन करने में आनंद आता है। जीवन के सैंतालीस बसंत पार कर चुके हैं और बढ़ते वक़्त के साथ वे ठहराव के पक्षधर हैं। लोकेश की लेखन शैली की विशिष्टता यही है कि वे किसी एक शैली या रस से अभिभूत अथवा बंधा महसूस नहीं करते। उनकी लिखी अमूमन सभी कहानियाँ विविधता लिए हुए होती हैं। और यह बात उनके पाठक अपनी समीक्षाओं में लगातार लिखते आएं हैं। हमेशा की तरह वे आशा करते हैं कि यह उपन्यास पढ़कर आप उन्हें अपनी पसंद-नापसंद से अवगत करवाएंगे। पुस्तक के बारे में : कितनी बार हमें लगता है कि हमारे हाथों यह काम कैसे हो गया। या यह निर्णय हम कैसे ले बैठे। कौन हमारे सिर पर सवार था, जब हमारे मुँह से वह बात निकली थी। कैसे हमने अपने ह्रदय को अनसुना कर दिया और वह कर डाला जो नहीं करना चाहिए था। जैसे आप ऐसा सोचते हैं वैसा ही उपन्यास के मुख्य पात्र राजा यशोवर्धन का भी सोचना है। जो गए तो थे, वन देवी से वरदान माँगने पर साथ लेकर आए श्राप भी। ऐसा श्राप जिससे मुक्ति संभव नहीं थी। समय के साथ वरदान भी फला और श्राप भी। बल्कि दोनों साथ-साथ ही फले यह कहना अधिक उपयुक्त होगा। अम्बुजम किले की प्राचीरों के मध्य बहुत कुछ ऐसा रहस्यमय घटा, जिस पर किसी का कोई वश नहीं था और न ही उसकी व्याख्या संभव थी। अम्बुज राजवंश की वंश बेल ने भी अपना आकार लिया और अपने पाश में राजसिंहासन को ऐसा दबोचा कि राजा यशोवर्धन और रानी ज्योत्सना भी हतप्रभ रह गए। फिर क्या हुआ और क्या नहीं हुआ इसे जानने के लिए अच्छा होगा कि हम राजा यशोवर्धन के साथ मोहना वन की उस यात्रा पर निकलें जहाँ से यह सब शुरू हुआ था।

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Reviews (2)

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